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आज के समय में हम सभी को अपनी दाल-रोटी के लिए काम करना है : अमिताभ

मुंबई। एक लंबे समय से कानों में यह कडक़ आवाज एक खास तरह का अहसास करा रही है। यह देश की सर्वाधिक मूल्यवान, भारी भरकम आवाज है, अकेली और अनोखी। जब वह अपनी नई थ्रिलर ‘बदला’ का एक संवाद बोलते हैं, दमदार आवाज मेरे कानों में गूंज उठती है, झनझना उठती है -‘मैं वो 6 देखूं जो तुम दिखा रही हो या वो 9 जो मुझे देखना है’।

इस आवाज की अपने आप में एक खासियत है। इसे सजाने-संवारने के लिए किसी और तकनीक की जरूरत नहीं है। अमिताभ बच्चन और उनके शिल्प ने आज कई पीढिय़ों पर राज किया है। इस फिल्मोद्योग में वह 50 साल पूरे कर चुके हैं।

अमिताभ ने आईएएनएस के साथ अपने साक्षात्कार में कहा कि वह सबसे पहले एक घटना को लेकर एक संदेश देना चाहते हैं, जिसने उन्हें हाल ही में अपार पीड़ा पहुंचाई है। ‘‘सबसे पहले भरे दिल से हम पुलवामा हमले में शहीद हुए अपने वीर जवानों के लिए और हर क्षण हमारी सुरक्षा के लिए लडऩे वाले बहादुर जवानों के लिए शोक संवेदना जाहिर करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।’’

साक्षात्कार के दौरान कई ऐसे तथ्य रहे, जिनपर हमारे समय के सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म स्टार ने ठंडे, सुस्त जवाब दिए, लेकिन उनमें विनम्रता हमेशा बनी रही। स्पष्ट कहा जाए तो उनके लिए आभा और प्रशंसा कोई मायने नहीं रखती, लेकिन दूसरे लोग, उनके प्रशंसक कुछ और सोच सकते हैं। विशेषण, अतिशयोक्ति और शब्दाडंबर उनके रास्ते में आए, लेकिन उन्होंंने उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। अभी भी लोग उनके मुरीद हैं। उनके भीतर का इंकलाब (उनके जन्म के समय पिता हरिवंश राय बच्चन ने उन्हें यह नाम दिया था, लेकिन बाद में बदलकर अमिताभ कर दिया) अभी भी शांत नहीं पड़ा है, और वह एक पूर्ण अभिनेता को तलाश रहा है।

ऐसे अमिताभ से हुई बातचीत के अंश इस प्रकार हैं :

-आप 50 साल की अपनी इस यात्रा को किस रूप में लेते हैं, जब अब्बास साहेब आपको कलकत्ता से यहां लाए था और ‘सात हिंदुस्तानी’ में से एक किरदार के लिए चुना था? और यह यात्रा सुजोय घोष और ‘बदला’... तक पहुंच चुकी है!

एक दिन के बाद दूसरा दिन आता है और उसी तरह दूसरा काम भी। लेकिन मैंने अतीत में सुजोय के साथ काम किया है। कहानी और निर्देशक मुझे पसंद है, कहानी में जो सस्पेंस और थ्रिल है, उसने मुझे प्रभावित किया। सुजोय ने कहानी बनाई है और वह बेचैन हैं। वह अपने कलाकारों से परफेक्शन चाहते हैं, वह अपनी विचार प्रक्रिया को लेकर और उसे साकार करने को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। वह सिनेमा के व्याकरण की बहुत अच्छी समझ रखते हैं।

- आप ने महान निर्देशकों और अभिनेताओं के साथ काम किया है। क्या आप मानते हैं कि हृषिदा और प्राण आप के पसंदीदा हैं, दोनों अलग-अलग तरीके से आपके लिए भाग्यशाली थे...आप ने हृषिदा के साथ 10 फिल्में कीं?

जिस भी निर्देशक, अभिनेता, लेखक, निर्माता, सहयोगी के साथ मैंने काम किया, सभी मेरे लिए पसंदीदा रहेंगे...

- तमाम सारे शीर्ष अमेरिकी अभिनेताओं ने ली स्ट्रासबर्ग के अभिनय के तरीके को अपनाया है, जिन्हें हमने ‘गॉडफादर 2’ में हायमन रोथ के रूप में देखा था, जिनके साथ उनके शिष्य अल पैसिनो ने काम किया था, यह दिलचस्प सिनेमा था। जब आप इस दुनिया में आए तो क्या आपने अभिनय का कोई प्रशिक्षण लिया या किसी की शैली को अपना लिया या किसी ने आपके काम पर असर डाला?

बिल्कुल नहीं, मैंने अभिनय का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया, और न तो मैंने जाने-अनजाने किसी का अनुसरण किया, जब तक कि हमारे निर्माता ने मुझसे वैसा करने के लिए नहीं कहा। और इस तरह के कुछ मौके आए। मुझे न तो अभिनय का कोई तरीका पता है और न तो मैंने कभी कोई बड़ी छलांग ही लगाई।

- हॉलीवुड में किसके काम को आप पसंद करते हैं? क्रिस्टोफर प्लमर चिरयुवा है और लगता है अच्छा कर रहे हैं...वही स्थिति क्लिंट ईस्टवूड की है, लेकिन ज्यादातर निर्देशक के रूप में?

मार्लन ब्रांडो, मोंटगोमरी क्लिफ्ट, जेम्स डीन...

- इन दिनों रणवीर सिंह अपनी भूमिकाओं को बेहतरीन तरीके से जी रहे हैं...मेरा मानना है कि आपकी कई भूमिकाओं के लिए काफी तैयारी की जरूरत रही होगी, उदाहरण के लिए ‘पा’ या ‘ब्लैक’ में...क्या आप इस तरह की कठिन भूमिकाओं के लिए अपने शिल्प के बारे में कुछ बताएंगे?

मेरे पास कोई शिल्प नहीं है और न तो यही पता है कि दूसरे लोग अच्छा काम करते हैं तो उसके लिए क्या और कैसे करते हैं... मैं लेखक के लिखे शब्दों का और निर्देशकों के निर्देशों का यथासंभव सावधानी से अनुसरण करता हूं। ‘ब्लैक’ के लिए हमने दिव्यांगों की सांकेतिक भाषा सीखी। ‘बदला’ एक अलग तरह की एक थ्रिलर है, जो वर्षों से आज भी हमें बांध कर रखती है। मेरी पीढ़ी के कुछ लोगों के लिए ‘महल’ स्मृतियों में बनी हुई है, क्योंकि यह 1949 की एक ऐतिहासिक छाप वाली फिल्म थी, जिसमें अशोक कुमार और मधुबाला ने काम किया था और इसका संगीत मौलिक था। दोनों हिंदी सिनेमा के मजबूत ताने-बाने का हिस्सा रहे हैं। (अमिताभ ने भी अपने शुरुआती समय में दो बहुत जोरदार संस्पेस थ्रिलर ‘परवाना’ और ‘गहरी चाल’ में काम किया था)।

-आप ने हमेशा कहा है अपने अभिनय करियर में आप भाग्यशाली रहे हैं। क्या ये पंक्तियां आपके जीवन का मूलमंत्र है- मैं अकेला ही चला जा रहा था, लोग जुड़ते चले गए और कारवां बनता चला गया?

अपने पेशे में मूलमंत्र का अर्थ मुझे नहीं पता... मुझे नहीं पता कि मैं भाग्यशाली रहा हूं।

- आपके शिखर के वर्षों के एक बड़े हिस्से के दौरान मीडिया के साथ आपका एक बहुत ही कठिन रिश्ता रहा है, एक समय मीडिया ने आपका बहिष्कार तक कर दिया था...और आज मीडिया के साथ आपका बहुत अच्छा रिश्ता है। इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे और आपने इस दूरी को मिटाने के लिए क्या कुछ किया?

मैं समझता हूं कि आपको यह अच्छी तरह पता है कि कोई भी व्यक्ति न तो मीडिया से बहुत करीब रह सकता है और न बहुत दूर ही। मीडिया चौथा स्तंभ है, देश की अंतरात्मा है। मेरे पास अपनी अंतरात्मा के साथ जीने की क्षमता, या दुस्साहस है, लेकिन मीडिया के साथ नहीं। इसके बारे में सोचना मेरे लिए मूर्खता होगी।

- फिल्मोद्योग में 50 साल हो चुके हैं, फिर भी आपके भीतर का कलाकार उसी तरह जिंदा और सक्रिय है। आपको ऊर्जा कहां से मिलती है? या यह काम के प्रति सम्मान है, जो आपकी अतंर्निहित नैतिकता को परिभाषित करता है?

मुझे समझ में नहीं आता कि आप या अन्य कई लोग मुझसे यह सवाल क्यों पूछते हैं?

- ‘सात हिंदुस्तानी’ के बाद के वर्षों में कई फिल्में फ्लाप हुई, लेकिन कोई मौलिक काम, यहां तक कि सुनील दत्त की ‘रेशमा और शेरा’ की कोई छोटी-सी भूमिका, या ‘आनंद’ से पहले की किसी फिल्म के अनुभव को याद करना चाहेंगे?

सिर्फ यही इच्छा रहती थी कि कोई दूसरा काम मिले। अधिकांश बार असफलता ही मिली।

- क्या स्कूल में आपने कोई शेक्सपियर किया, जहां आपने अपनी जोरदार आवाज और अभिनय का प्रदर्शन किया हो?

नहीं, स्कूल में कभी शेक्सपियर नहीं किया...

-अभिनय करते आपको 50 साल पूरे हो चुके हैं। क्या विजय के अलावा कोई किरदार है, जो आपके जहन में जिंदा हो, और क्यों?

नहीं ऐसा कोई नहीं है...


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Web Title-Originality is a dichotomous terminology: Amitabh
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