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जावेद अख्तर : जेब में चंद पैसे लेकर निकल पड़े थे स्टार बनने, फुटपाथ पर गुजारी कई रातें

Javed Akhtar: He set out to become a star with just a few coins in his pocket, and spent many nights on the streets. - Bollywood News in Hindi

मुंबई । 'कभी जो ख्वाब था वो पा लिया है, मगर जो खो गई वो चीज क्या थी'... ये सिर्फ एक लाइन नहीं, जावेद अख्तर की नजर में इंसान की हकीकत है। जावेद अख्तर को जादू नाम से भी जाना जाता है और यह जादू उनके लिए पूरी तरह सही है। बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनका गीत और कविताएं लाखों लोगों के दिलों को छू जाती हैं। एक ऐसा दौर भी था, जब जावेद अख्तर अपने सपनों की नगरी मुंबई पहुंचे, और जेब में उनके पास सिर्फ चंद पैसे थे। किसी के लिए यह मुश्किल समय होता है, लेकिन उन्होंने इन हालात को चुनौती के तौर पर लिया। जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। बचपन में वह अपने आसपास की दुनिया से काफी प्रभावित होते थे। उनके दोस्त अमीर घरों के थे और उनके पास महंगी घड़ी से लेकर फाउंटेन पेन जैसी आकर्षक चीजें रहती थीं। इन सब से प्रभावित होकर एक दिन जावेद ने ठान लिया कि वह बड़े होकर अमीर बनेंगे। उनके परिवार का माहौल भी पढ़ाई और साहित्य में गहरी रुचि रखने वाला था। जावेद के पिता और दादा दोनों शायर थे, जिससे जावेद के भीतर शब्दों और शायरी का प्यार बचपन में ही पैदा हो गया।
जावेद अख्तर ने अपनी शिक्षा लखनऊ, अलीगढ़ और भोपाल में पूरी की। बचपन में ही उन्होंने साहित्य और कविता की ओर रुचि दिखाई। उनका विश्वास हमेशा से था कि जिंदगी में कठिनाइयां आएंगी, लेकिन उनको मेहनत और ईमानदारी से पार किया जा सकता है। यही सोच के साथ वह मुंबई के सफर के लिए निकल पड़े।
1964 में जावेद अख्तर मुंबई पहुंचे। इस शहर की चमक-धमक और फिल्म इंडस्ट्री का आकर्षण उनके लिए नए अवसर लेकर आया, लेकिन शुरुआत बिल्कुल भी आसान नहीं थी। उनके पास केवल 27 पैसे थे। जावेद ने अपने उस समय को याद करते हुए एक इंटरव्यू में कहा था, ''जब मेरे पास इतना कम पैसा था, तब भी मेरा हौसला और आत्मविश्वास कम नहीं हुआ। मैंने ठान लिया था कि हर मुश्किल का सामना करेंगे और अपने सपनों को पूरा करेंगे।''
मुंबई में जावेद अख्तर ने कमाल अमरोही के स्टूडियो में कुछ दिन बिताए। कई रातें उन्होंने खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर बिताईं। शुरुआत में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम किया, और कई बार हीरो के कपड़े, हीरोइन की सैंडल जैसी छोटी-छोटी जिम्मेदारियां भी निभाईं। इन अनुभवों ने उन्हें सिनेमा की दुनिया को समझने और सीखने का मौका दिया।
फिल्म इंडस्ट्री में उनके करियर की शुरुआत 'सरहदी लुटेरा' से हुई। इसके बाद उन्होंने सलीम खान के साथ मिलकर कई हिट फिल्में दीं। 'अंदाज', 'यादों की बारात', 'जंजीर', 'दीवार', 'हाथी मेरे साथी', और 'शोले' जैसी फिल्मों की पटकथा उनकी और सलीम की जोड़ी का कमाल थी। मेहनत और प्रतिभा के दम पर उन्होंने आठ फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किए। 1999 में साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
जावेद अख्तर का जीवन सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपनी किताबों और कविताओं में अपने बचपन की यादें, संघर्ष और जिंदगी के अनुभव साझा किए। साहिर लुधियानवी और कमाल अमरोही जैसी हस्तियों के साथ उनके रिश्ते और सीखने का अनुभव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं। उनकी कहानी यह दिखाती है कि कितनी भी मुश्किल परिस्थितियां हों, अगर हौसला और लगन हो, तो हर सपना पूरा हो सकता है।
आज जावेद अख्तर बॉलीवुड के उन कलाकारों में शुमार हैं, जिनकी बातें, गीत और कविताएं पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनके जीवन का वह दौर जब जेब में सिर्फ 27 पैसे थे, अब लोगों के लिए हौसले और सपनों की मिसाल बन गया है।
--आईएएनएस

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Web Title-Javed Akhtar: He set out to become a star with just a few coins in his pocket, and spent many nights on the streets.
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