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गुलाम मुस्तफा खान: कैसे एक शास्त्रीय गायक ने बॉलीवुड की आवाजों को तराशा?

Ghulam Mustafa Khan: How a Classical Singer Shaped the Voices of Bollywood? - Bollywood News in Hindi

मुंबई । 3 मार्च 1931 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे गुलाम मुस्तफा खान के नसीब में संगीत उनके जन्म से पहले ही लिख दिया गया था। उनके पिता उस्ताद वारिस हुसैन खान और दादा इनायत हुसैन खान (रामपुर-सहसवान घराने के संस्थापक) ने तय कर लिया था कि यह बच्चा घर की 'खलीफा' परंपरा को आगे बढ़ाएगा। उस्ताद अक्सर याद करते थे कि जब दूसरे बच्चे गलियों में कंचे खेलते थे, तब वे अपने पिता के सामने घंटों 'खरज' (मंद सप्तक) का रियाज करते थे। उनके पिता संगीत के मामले में बेहद सख्त थे। एक बार उस्ताद ने बताया था, "मेरे पिता मुझे प्यार बहुत करते थे, पर जब मैं रियाज के लिए बैठता, तो वे मुझे किसी फौजी की तरह अनुशासन में रखते थे।" यही वह अनुशासन था जिसने उनके गले में वह 'तैयारी' पैदा की, जो आगे चलकर साढ़े तीन सप्तकों तक बिना थके दौड़ती थी। उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान का घराना, यानी 'रामपुर-सहसवान', हिंदुस्तानी संगीत का वह अनूठा कोना है जहां ग्वालियर घराने की स्थिरता और रामपुर के नवाबों की नफासत मिलती है। खान साहब की गायकी में 'नोम-तोम' का आलाप ध्रुपद की गंभीरता लाता था, तो उनकी 'सपाट तानें' बिजली की कौंध जैसी महसूस होती थीं।
बहुत कम लोग जानते हैं कि उस्ताद सिर्फ एक परफॉर्मर नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सोच वाले शोधकर्ता भी थे। उन्होंने आचार्य केसी देव बृहस्पति के साथ मिलकर 'जाति-गायन' जैसी प्राचीन भारतीय संगीत पद्धति पर काम किया, जो सदियों से किताबों में दफन थी।
उन्होंने अपनी आवाज के जरिए यह साबित किया कि भारतीय संगीत की 22 श्रुतियां कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं, बल्कि हकीकत हैं। उनके गाए 'सूक्ष्म स्वर-अंतराल' आज भी संगीत के छात्रों के लिए शोध का विषय हैं।
शास्त्रीय गायकों में अक्सर एक झिझक होती थी कि वे फिल्मों के लिए गाएं या नहीं, लेकिन खान साहब ने इस दीवार को गिरा दिया। 1981 की फिल्म 'उमराव जान' में उनकी गाई 'रागमाला' आज भी संगीत का व्याकरण मानी जाती है। जब वे गाते हैं, "प्रथम धर ध्यान..." (भैरव) से लेकर "दर्शन देहो शंकर महादेव..." (यमन) तक, तो श्रोता एक अलग ही रूहानी दुनिया में पहुंच जाता है। मुजफ्फर अली और खय्याम साहब हमेशा कहते थे कि उस्ताद की आवाज के बिना 'उमराव जान' का वह दौर अधूरा रहता।
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान की सबसे बड़ी विरासत उनके बनाए हुए शिष्य हैं। उन्हें 'वॉइस कल्चर' का सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था।
लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी महान हस्तियों ने आवाज की सूक्ष्मताओं के लिए उनसे परामर्श लिया। एआर रहमान ने उनके कदमों में बैठकर शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। सोनू निगम उन्हें अपना 'आध्यात्मिक पिता' मानते हैं। सोनू अक्सर भावुक होकर कहते हैं, "खान साहब ने मुझे सिर्फ गाना नहीं, सुरों को महसूस करना सिखाया।" हरिहरन की गजलों में जो ठहराव है, वह खान साहब की तालीम का ही नतीजा है।
भारत सरकार ने गुलाम मुस्तफा खान को पद्म श्री (1991), पद्म भूषण (2006) और पद्म विभूषण (2018) से नवाजा, लेकिन उस्ताद के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उनके शिष्यों की सफलता और वह 'दाद' थी जो उन्हें दुनियाभर के मंचों पर मिलती थी। चाहे वह ब्रिटेन की महारानी के सामने प्रस्तुति हो या बाल्टीमोर की मानद नागरिकता, खान साहब ने हमेशा अपनी भारतीयता और रामपुर की तहजीब को ऊंचा रखा।
17 जनवरी 2021 को मुंबई में इस महान कलाकार ने अपनी अंतिम सांस ली। 89 वर्ष की उम्र में जब वे इस दुनिया को छोड़ चले, तो अपने पीछे चार बेटों (मुर्तुजा, कादिर, रब्बानी और हसन) और पोतों की एक पूरी फौज छोड़ गए जो आज भी उसी शुद्धता से गा रहे हैं। 'उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान अकादमी' और उनकी स्मृति में शुरू हुई 'आईसीसीआर फेलोशिप' इस बात का प्रमाण है कि एक सच्चा कलाकार कभी मरता नहीं।
उस्ताद गुलाम मुस्तफा एक ऐसे 'पुल' थे जिन्होंने बीते हुए कल की शास्त्रीय कठोरता को आज के युवाओं की सुरीली चाहत से जोड़ दिया।
--आईएएनएस

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Web Title-Ghulam Mustafa Khan: How a Classical Singer Shaped the Voices of Bollywood?
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