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Exclusive Interview : कैंसर जैसी बीमारियां अब हमारे घरों तक पहुंच चुकी हैं, इस पर सोचना बेहद जरूरी है : श्रेयस तलपड़े

Exclusive Interview: Diseases Like Cancer Have Now Reached Our Homes; Its Time We Seriously Think About It: Shreyas Talpade - Bollywood News in Hindi

—राजेश कुमार भगताणी फिल्मों में किसी गंभीर और सामाजिक सरोकार से जुड़े विषय को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारना कलाकारों के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है। आगामी 24 जुलाई को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही पैनइंडिया फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ भी एक ऐसे ही संवेदनशील विषय को दर्शकों के सामने लाने का प्रयास कर रही है। फिल्म में अभिनेता श्रेयस तलपड़े एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। अपने सशक्त अभिनय और अलग-अलग तरह के किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले श्रेयस इस फिल्म में एक नए अंदाज में नजर आएंगे। फिल्म में उनकी भूमिका, इस विषय से जुड़ने का अनुभव, किरदार की तैयारी, निर्देशक के साथ काम करने का अनुभव और सिनेमा के सामाजिक दायित्व जैसे कई पहलुओं पर खास खबर डॉट कॉम के संवाददाता राजेश कुमार भगताणी को उनसे विशेष बातचीत करने का अवसर मिला। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश—
प्रश्न: 'द इंडिया स्टोरी' (The India Story) से जुड़ने की सबसे बड़ी वजह क्या रही—कहानी या आपका किरदार?
श्रेयस: दोनों सर। मतलब, सिर्फ अच्छी कहानी और बुरा किरदार, या फिर अच्छा किरदार और बुरी कहानी, एक साथ मेल नहीं खाते। लेकिन मेरे ख्याल से दोनों ही ज़रूरी होते हैं। इसके साथ ही डायरेक्टर का इंटेंट (इरादा) क्या है—वह क्या बताना चाह रहे हैं, और मुद्दा कैसा है, यह भी मायने रखता है। तो ये सारी चीज़ें पक्ष में रहीं। किरदार भी मज़बूत है, कहानी अच्छी है, और मुद्दा भी बहुत रिलेवेंट (प्रासंगिक) है। इसी वजह से मैंने यह फिल्म करने का फैसला लिया।

प्रश्न: और इस किरदार की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
श्रेयस तलपड़े : यह एक पिता और बेटी की कहानी है। मुझे लगता है कि इसका जो ग्राफ है, वह बहुत दिलचस्प, संवेदनशील और भावुक है। एक अभिनेता के तौर पर आप हमेशा ऐसे किरदारों और दृश्यों के इंतज़ार में रहते हैं। जैसा कि मैंने कहा, यह पिता-बेटी के भावनात्मक रिश्ते वाली फिल्म है।
प्रश्न: अपने किरदार को समझने और उसे पर्दे पर जीवंत बनाने के लिए आपने किस प्रकार की तैयारी की?
श्रेयस तलपड़े : सर, मूल रूप से तो डायरेक्टर आपकी मदद करते हैं। उनके दिमाग में वह किरदार कैसा दिखता है, वे यह साझा करते हैं। इसके अलावा आप स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, दृश्यों को समझते हैं, अपने सह-कलाकारों के साथ रिहर्सल और तैयारी करते हैं। मुख्य मुद्दा क्या है, उसे समझने की कोशिश करते हैं और उससे जुड़े तथ्यों को जानते हैं। यह पूरी प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और यहाँ तक कि शूटिंग के दौरान भी बहुत सी चीजें सामने आती हैं। इसलिए तैयारी एक सतत प्रक्रिया (ongoing process) है।

प्रश्न: क्या आपको लगता है कि यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करेगी?

श्रेयस तलपड़े : यह हमारी ख्वाहिश है कि लोग कम से कम इस मुद्दे के बारे में सोचें, जो हम सबके इतने करीब और प्रासंगिक है। अगर इसके लिए हम कुछ कदम उठा सकें, तो उससे बेहतर कुछ नहीं होगा। लेकिन कम से कम सोचना बेहद ज़रूरी है; क्योंकि जो बीमारी कुछ सालों पहले तक हमारे इर्द-गिर्द भी नहीं थी, वह आज हमारे घरों तक पहुँच चुकी है—जैसे कैंसर। इसलिए यह सोचना बहुत ज़रूरी है कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसे रोकने या कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं।

प्रश्न: इस फिल्म का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा कौन सा रहा?
श्रेयस तलपड़े : इसमें क्लाइमेक्स का जो एक दृश्य है, वह मेरे लिए सबसे ज़्यादा चुनौतीपूर्ण था।
प्रश्न: कोई ऐसा अनुभव जिसे आप हमेशा याद रखना चाहें?

श्रेयस तलपड़े : मैं इस पूरी फिल्म को ही याद रखूँगा। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, वह क्लाइमेक्स वाला दृश्य बहुत ही भावुक और संवेदनशील था, इसलिए वह मुझे हमेशा याद रहेगा।
प्रश्न: आप पिछले दो दशक से भी ज़्यादा समय से फिल्मों में सक्रिय हैं। आपने पारिवारिक, गंभीर और सामाजिक फिल्मों में अभिनय और निर्माण किया है; मराठी फिल्मों का निर्देशन भी किया है और एक हिंदी फिल्म भी निर्देशित की है। ऐसे में 'द इंडिया स्टोरी' आपके अभिनय के सफर में किस प्रकार से एक अलग स्थान रखती है?
श्रेयस तलपड़े : हर फिल्म अभिनेता के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण और विशेष होती है। 'द इंडिया स्टोरी' भी वैसी ही है। जैसा कि मैंने कहा, इसमें एक बहुत ही रिलेटेबल (जुड़ाव महसूस कराने वाला) और समसामयिक मुद्दा है। मैं चाहूँगा कि लोग इसे सराहें, इस पर विचार करें, इस बारे में बातें करें और सवाल पूछें। दर्शक इसे जितना खास बनाएँगे, यह हमारे लिए उतनी ही स्पेशल रहेगी। लेकिन फिल्म का भविष्य जो भी हो, मुझे हमेशा गर्व रहेगा कि मैं 'द इंडिया स्टोरी' जैसी फिल्म से जुड़ा।

प्रश्न: श्रेयस जी, जैसा कि आप देख रहे होंगे कि आजकल दर्शकों की पसंद बहुत तेज़ी से बदल रही है। कई बार जिन फिल्मों से बड़ी उम्मीदें होती हैं, वे असफल हो जाती हैं और जिनके बारे में कुछ नहीं सोचा जाता, वे ब्लॉकबस्टर बन जाती हैं। ऐसे दौर में, आप विषय-आधारित (content-driven) फिल्मों के भविष्य को किस नज़रिए से देखते हैं?
श्रेयस तलपड़े : विषय-आधारित फिल्में भी अगर दिलचस्प तरीके से बनाई जाएँ और लोगों के दिलों को छू लें, तो वे ज़रूर चलती हैं। जैसा कि आपने कहा, दर्शकों की पसंद हमेशा से ऐसी रही है जिसे आज तक कोई पूरी तरह समझ नहीं पाया है। कई बड़े दिग्गज भी आए और गए जिन्हें लगता था कि उनकी फिल्म सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर होगी, लेकिन दुर्भाग्य से वे बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलीं। वहीं कुछ ऐसी फिल्में जिनके बारे में पहले से कोई चर्चा नहीं थी, जैसे कन्नड़ फिल्म 'कांतारा' को ही देख लीजिए, उसने आकर बॉक्स ऑफिस पर हंगामा कर दिया। अभी हाल ही में मराठी में 'गोलबंद' नाम की फिल्म आई, जिसके बारे में रिलीज़ से पहले ज़्यादातर लोगों को पता भी नहीं था, लेकिन वह 100 करोड़ से ऊपर का बिजनेस कर गई। तो ऐसे कई सरप्राइजेस (चमत्कार) होते रहते हैं, और हम भी इसी उम्मीद पर काम करते हैं कि हमारा काम भी लोगों को पसंद आए, वे उसे सराहें, भारी संख्या में थिएटर्स में जाकर फिल्म देखें और फिल्म सफल हो। हर फिल्ममेकर इसी के लिए प्रयास करता है।
प्रश्न: सर, क्या आपको लगता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का एक माध्यम है, या यह समाज में संवाद और जागरूकता पैदा करने की जिम्मेदारी भी निभाता है?

श्रेयस तलपड़े : यह दोनों ही है सर। कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के उद्देश्य से बनाई जाती हैं, और उनमें से भी लोग अपनी पसंद की सीख ले लेते हैं। वहीं कुछ फिल्में समाज को आईना दिखाती हैं और कोई संदेश या स्टेटमेंट देना चाहती हैं। तो दोनों ही तरह की फिल्में अस्तित्व में हैं। अब किसी फिल्म से दर्शक क्या ग्रहण करते हैं, यह पूरी तरह से उन पर निर्भर करता है।
प्रश्न: सर, इस सिलसिले में मैं आपकी दो दशक पहले आई नागेश कुकुनूर की फिल्म 'डोर' (Dor) का ज़िक्र करना चाहूँगा। वह उस समय के हिसाब से एक समानांतर या कला फिल्म (art film) जैसी थी, लेकिन उसने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। क्या आप उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी आप ऐसी फिल्मों में काम करेंगे?
श्रेयस तलपड़े : मैं बिल्कुल चाहूँगा सर। हम अभिनेता हैं और हमेशा ऐसे किरदारों के इंतज़ार में रहते हैं जो हमारे हिस्से आएँ, जिन्हें हम निभा सकें और अपनी काबिलियत लोगों को दिखा सकें। इसलिए हमारी कोशिश जारी रहती है। मैं निश्चित रूप से चाहूँगा कि 'डोर' जैसी फिल्में और किरदार भविष्य में भी बनते रहें।
प्रश्न: द इंडिया स्टोरी की टीम के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा?
श्रेयस तलपड़े : बहुत बढ़िया था सर, बहुत ही बेहतरीन। टीम के लोग बहुत समर्पित और प्रोफेशनल हैं। भले ही वे नए हैं, लेकिन उनकी नीयत और समर्पण बिल्कुल सही जगह पर है। उन्होंने इसी सही नीयत के साथ यह फिल्म बनाने की कोशिश की है।
प्रश्न: क्या भविष्य में आप किसी फिल्म के निर्देशन की योजना बना रहे हैं?
श्रेयस तलपड़े : मैं एक-दो विषयों पर काम कर रहा हूँ, लेकिन अभी तक अंतिम रूप से यह तय नहीं किया है कि इसका निर्देशन कब करूँगा।

प्रश्न: जो युवा कलाकार अपनी पहचान बनाने के सपने देख रहे हैं, उनके लिए आपका क्या संदेश है?
श्रेयस तलपड़े : सपने ज़रूर देखने चाहिए सर, और उन सपनों के पीछे पूरी मेहनत व लगन से जुट जाना चाहिए। कब और कैसे सपने पूरे हो जाएँ, यह कोई नहीं जानता। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अवसर (opportunity) को कभी हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। जो भी अवसर सामने आए, उसे पहचानना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि वह शुरुआत में भले ही छोटा लगे, लेकिन आपके सपनों को साकार करने में उसका सबसे बड़ा योगदान हो सकता है।

प्रश्न: आपने विशेष रूप से देओल परिवार के दोनों बेटों (सनी देओल और बॉबी देओल) के साथ काम किया है और उन्हें एक साथ निर्देशित भी किया है। उन दोनों के अभिनय और शैली में आपने क्या मुख्य अंतर पाया?

श्रेयस तलपड़े : (हँसते हुए) दोनों में बहुत अंतर है। सनी पाजी की शैली अलग है और बॉबी की अलग। हम सब सनी पाजी को देखते हुए बड़े हुए हैं। 'घायल', 'डकैत', 'अर्जुन' या उनकी शुरुआत की फिल्म 'बेताब' जैसी फिल्मों से हम उन्हें फॉलो करते आ रहे हैं। इसलिए उनकी शैली बिल्कुल अलग है और बॉबी की बिल्कुल अलग। जब मैं निर्देशन कर रहा था, तब मुझे सनी पाजी से बहुत कुछ सीखने को मिला। बॉबी पूरी तरह से एक डायरेक्टर्स एक्टर (निर्देशक के अनुसार काम करने वाले अभिनेता) हैं; आप उन्हें जैसा समझाएंगे, वे उसे वैसे ही पर्दे पर उतार देंगे। सनी पाजी भी निर्देशक की सोच का सम्मान करते हैं, लेकिन उनका अनुभव इतना विशाल है कि हमारे जैसे लोगों के लिए उन्हें निर्देश देने से बेहतर उनसे सीखना होता है। निर्देशन के दौरान मुझे उनसे बहुत मदद मिली। वहीं बॉबी की शैली बिल्कुल अलग है, वे खुद को पूरी तरह से निर्देशक को सौंप देते हैं और उनकी सोच के अनुसार काम करते हैं। लेकिन दोनों ही कलाकार बेहद समर्पित और पूरी तरह प्रोफेशनल हैं।

प्रश्न: अपने प्रशंसकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

श्रेयस तलपड़े : सबसे पहले तो मैं उनका दिल से आभार व्यक्त करना चाहूँगा कि वे इतने सालों से मुझे इतना प्यार दे रहे हैं। मेरे अच्छे और बुरे, दोनों ही समय में वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हैं; मुझे सपोर्ट, प्रोत्साहित और प्रेरित करते रहे हैं। मैं उनसे बस यही कहना चाहूँगा कि जब भी मुझे मौका मिलता है, मेरी यही कोशिश रहती है कि मैं उन्हें ऐसा काम दिखाऊँ जो उनका मनोरंजन करे, उन्हें कभी भावुक करे तो कभी हँसाए। मैं कुछ ऐसा काम करना चाहता हूँ जिस पर उन्हें गर्व हो कि वे मेरे प्रशंसक हैं। मेरी कोशिश यही रहेगी कि प्रशंसकों का यह दायरा और बढ़े और मुझे उनका प्यार व दुआएँ मिलती रहें।

प्रश्न: आपने काजल अग्रवाल के साथ पहली बार इस फिल्म में काम किया है। वे हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों, दोनों में सक्रिय हैं। उनके साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा?

श्रेयस तलपड़े : बहुत बढ़िया था सर, वे बहुत ही सुलझी हुई और प्रोफेशनल अभिनेत्री हैं। अलग-अलग भाषाओं में काम करने का उनके पास बेहतरीन अनुभव है और वे सेट पर पूरी तैयारी के साथ आती हैं। जब आपके साथ इतना मज़बूत सह-कलाकार हो, तो आपका खुद का काम भी बेहतर हो जाता है। मैं निर्देशक का आभारी हूँ कि उन्होंने इस फिल्म के लिए इतनी अच्छी अभिनेत्री को चुना, जिन्होंने फिल्म में बेहद खूबसूरत काम किया है।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद श्रेयस जी। मैं उम्मीद करता हूँ कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल हो और विषय-आधारित फिल्मों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो।

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