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बिरजू महाराज: नृत्य से जब मंच पर चला दी थी ट्रेन, घुंघरुओं में बोलती थी कथक की आत्मा

Birju Maharaj: The Dancer Who Created the Sound of a Train on Stage; the Soul of Kathak Spoke Through His Anklets - Bollywood News in Hindi

मुंबई । शाम का वक्त था, लखनऊ के एक पुराने घर के आंगन में सात-आठ साल का एक दुबला-पतला बालक अपने पैरों में बंधे भारी घुंघरुओं के साथ कुछ ऐसी जुगलबंदी कर रहा था कि वहां मौजूद उस्ताद भी दंग रह गए। उस बच्चे के पैर जमीन पर नहीं, बल्कि ताल के उस बारीक धागे पर थिरक रहे थे जिसे पकड़ना बड़े-बड़े दिग्गजों के बस की बात नहीं होती। यह बालक कोई और नहीं, बल्कि भविष्य के 'कथक सम्राट' पंडित बिरजू महाराज थे। बिरजू महाराज का बचपन किसी परीकथा जैसा सुखद नहीं था। लखनऊ के मशहूर कालका-बिन्दादीन घराने में 4 फरवरी 1938 को जब उनका जन्म हुआ, तो उनका नाम 'दुखहरण' रखा गया था। शायद परिवार को आभास था कि यह बच्चा अपने हुनर से न केवल अपने घर का, बल्कि पूरी कला बिरादरी का दुख हर लेगा। बाद में उनका नाम 'बृजमोहन नाथ मिश्रा' पड़ा, जो दुनिया के लिए 'बिरजू महाराज' बन गए। महज नौ साल की उम्र में पिता और गुरु अच्छन महाराज का साया सिर से उठ गया। उस छोटी सी उम्र में, जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, बिरजू महाराज के कंधों पर सदियों पुरानी विरासत को सहेजने का भार आ गया था। उन्होंने अपने चाचाओं (लच्छू महाराज और शंभू महाराज) की देखरेख में अपनी कला को तराशा और उसे एक नई पहचान दी।
बिरजू महाराज की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सिर्फ नृत्य नहीं करते थे, वे 'कहानी' कहते थे। 'कथक' शब्द का अर्थ है 'कथा' कहे सो कथक कहावे'। उनके हाथों की भंगिमाएं औरआंखों की हरकतें बिना बोले ही पूरी रामायण या कृष्णलीला बयां कर देती थीं।
एक बार का किस्सा मशहूर है कि उन्होंने एक मंच पर केवल अपने पैरों की थाप से ट्रेन के चलने की आवाज, उसके इंजन की सीटी और पटरी की खटखटाहट पैदा कर दी थी। देखने वाले अपनी आंखों और कानों पर यकीन नहीं कर पा रहे थे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि बिरजू महाराज जितने अच्छे नर्तक थे, उतने ही बेमिसाल गायक और संगीतकार भी थे। उनकी ठुमरी सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। शास्त्रीय संगीत के सख्त अनुशासन को उन्होंने बड़े ही प्यार से फिल्मी पर्दे पर भी उतारा।
सत्यजीत रे की 'शतरंज के खिलाड़ी' से लेकर संजय लीला भंसाली की 'देवदास' और 'बाजीराव मस्तानी' तक, उन्होंने कथक को ग्लैमर के बीच भी उसकी पवित्रता के साथ पेश किया। 'काहे छेड़ मोहे' (देवदास) में माधुरी दीक्षित के भाव हों या 'मोहे रंग दो लाल' (बाजीराव मस्तानी) में दीपिका पादुकोण की नजाकत, इन सबके पीछे बिरजू महाराज की वह पारखी नजर थी जो जानती थी कि कैमरा और कला का तालमेल कैस बैठाना है। उन्हें फिल्म 'विश्वरूपम' के लिए नेशनल अवार्ड से भी नवाजा गया था।
दुनियाभर के सबसे बड़े मंचों पर परफॉरमेंस देने और पद्म विभूषण जैसे सम्मान पाने के बावजूद महाराज जी दिल से एक 'लखनवी रईस' थे, पैसों से नहीं, तहजीब से। उन्हें पतंग उड़ाने का और गैजेट्स का बड़ा शौक था। वे अक्सर बच्चों की तरह नई मशीनों और मोबाइल को देखकर चकित होते थे। उनके पास बैठने वाला हर शख्स उनकी सादगी का कायल हो जाता था।
17 जनवरी 2022 को जब दिल्ली की सर्द रात में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली, तो मानो कथक के पैरों से घुंघरू ही छिटककर बिखर गए, लेकिन बिरजू महाराज केवल एक नर्तक नहीं थे। वे तो एक बहती हुई नदी थे, जिसमें लय, सुर, ताल और अभिनय का संगम था।
--आईएएनएस

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Web Title-Birju Maharaj: The Dancer Who Created the Sound of a Train on Stage; the Soul of Kathak Spoke Through His Anklets
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