नई दिल्ली, 22 जून । एशियाई मुक्केबाजी में भारत बडी तेजी के साथ "पावरहाऊस" के रूप में उभर रहा है। बीजिंग ओलंपिक में इसकी पहली झलक देखने को मिली और फिर उसके दस महीने बाद भारतीय मुक्केबाजों ने एशियाई चैंपियनशिप में कमाल कर इस पर मुहर लगा दी। बीजिंग में जहां विजेंद्र कुमार कांस्य पदक जीता वही अखिल कुमार और जितेंदर कुमार कांस्य पद के करीब पहुंचकर चूक गए। इन तीनों की सफलता के बाद भारत में मुक्केबाजी को लेकर जर्बदस्त उत्साह ओर जुनुन पैदा हो गया। इसके बाद मुक्केबाजों ने चीन में आयोजित एशियाई मुक्केबाजी चैपियनशिप में सात पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मानवा लिया। भारतीय मुक्केबाजों ने एक स्वर्ण, दो रजत और चार कांस्य पदक जीते है। भारतीय टीम उज्बेकिस्तान और चैपियन चीन के बाद पदक तालिका में तीसरे स्थान पर रही। ऎसा नहीं है कि भारतीय मुक्केबाज अचानक ही अच्छा प्रदर्शन करने लगे है। इसे जानने के लिए 1982 में लौटना होगा जब भारत ने सियोल में आयोजित एशियाई चैपियनशिप में दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य जीता था।
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