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यूपी चुनाव: सुरक्षित सीटों पर किसी पार्टी का एकाधिकार नहीं रहा




लखनऊ | उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है। सभी राजनीतिक दल जाति विशेष के वोटरों में अपने पाले में करने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं। दलित मतदाताओं को रिझाने के लिए एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी `भीम` एप लॉन्च कर संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के नाम को भुनाने के प्रयास में दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती खुद को दलितों की मसीहा साबित करने में जुटी हैं।
इन सबके बीच रोचक बात यह है कि यदि पिछले कई विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो उप्र की सुरक्षित सीटों पर कभी भी एक पार्टी का एकाधिकार नहीं रहा है।

उप्र में दलित मतदाता विधानसभा चुनाव में काफी अहम रोल अदा करता है। पिछले पांच विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो दलित व पिछड़ों के लिए आरक्षित सीटों पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार नहीं रहा है।

दलित वोट कभी कांग्रेस का वोट बैंक माने जाते थे, लेकिन बाद में बसपा की स्थापना के बाद से ही दलितों का रुझान बदल गया। हालांकि आरक्षित सीटों पर गैर दलित मतों का ध्रुवीकरण हमेशा ही दलितों के खिलाफ रहा। दलितों का वोट भुनाने के लिए सभी पार्टियां दलित व पिछड़ों को ही उम्मीदवार बनाती हैं, लेकिन सफल वही रहा जो गैर दलित वोटों को साधने में सफल रहा।

वर्ष 1993 में सपा और बसपा एक साथ मिलकर विधानसभा चुनाव में उतरे, लेकिन उप्र की 93 सुरक्षित सीटों में से 38 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया। यह स्थिति राम मंदिर आंदोलन की वजह से थी। वर्ष 1996 में भी भाजपा सुरक्षित सीटों में से 36 सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखने में सफल रही। बसपा को 20 और सपा को 10 सुरक्षित सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

इसके बाद वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में स्थितियां बदलीं और समाजवादी पार्टी ने 89 सुरक्षित सीटों में से 35 पर अपना परचम लहाराया। इस वर्ष के चुनाव में बसपा की स्थिति भी ठीक रही। उसने 24 सीटों पर विजय हासिल की, जबकि भाजपा को केवल 18 सीटों पर जीत नसीब हुई।

इसके बाद वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने सुरक्षित सीटों पर अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन किया। बसपा ने 62 सीटों पर अपना कब्जा जमाया और उप्र में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

[@ ‘हॉट योगा गुरु’बिक्रम चौधरी हुआ कंगाल]

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