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फ्लैश बैक 2016 - राज्य सरकार के आदेश

flash back 2016 from punjab - News in Hindi

1. सिख गुरुद्वारा विधेयक राज्यसभा से बिना चर्चा के ही पारित
नई दिल्ली। सिख गुरुद्वारा अधिनियम में संशोधन के लिए पेश विधेयक को राज्यसभा ने 17 मार्च के दिन बिना चर्चा के ही ध्वनिमत से पारित कर दिया। सिख धार्मिक निकायों के मतदान से सहजधारी सिखों को दूर रखने के लिए 91 वर्ष पुराने कानून में संशोधन के लिए विधेयक लाया गया था। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को सिख गुरुद्वारा संशोधन विधेयक 2016 पेश किया था। बजट सत्र के पहले हिस्से के आखिरी दिन बुधवार को सभी दलों ने सहमति जताते हुए इसे पारित कर दिया। उपसभापति पीजे कुरियन ने कहा कि सदन ने एक मत से बिना चर्चा विधेयक पारित करने पर सहमति जताई है। मैं इसे पारित कर रहा हूं। इस विधेयक में सहजधारी सिखों को 1944 में दिए गए अपवाद को हटाने का प्रस्ताव किया गया है। सहजधारियों को कानून के तहत गठित होने वाले बोर्ड और समितियों के सदस्यों के चुनाव में मतदान का अधिकार दिया गया था। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में गृह मंत्रालय को सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। ये संशोधन 8 अक्टूबर 2003 से प्रभावी माना जाएगा। गृह मंत्रालय ने 8 अक्टूबर 2003 को अधिसूचना जारी की थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 20 दिसंबर 2011 को अधिसूचना निरस्त कर दी थी। अदालत ने संशोधन का फैसला विधायिका पर छोड़ा था।

2. 25 अप्रैल को लोकसभा ने भी किया सिख गुरुद्वारा अधिनियम -1925 में संशोधन विधेयक को पारित
नई दिल्ली। सिख गुरुद्वारा संशोधन विधेयक 2016 को संसद की मंजूरी मिल गई। लोकसभा ने सर्वसम्मति से इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन इससे पहले शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सदस्यों के बीच तीखी बहस हुई। इस विधेयक को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने गत 15 मार्च को राज्यसभा में पेश किया था। उसके अगले ही दिन इस विधेयक को उच्च सदन ने पारित कर दिया था। इस विधेयक में संशोधन के अनुसार, 21 साल की उम्र से अधिक का प्रत्येक सिख और जो मतदाता के रूप में पंजीकृत है। उसे सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और विभिन्न गुरुद्वारा प्रबंधन समितियों के चुनाव में वोट डालने का अधिकार है। हालांकि, कोई भी व्यक्ति जो बाल या दाढ़ी कटवाता है उसे इन चुनावों में मत देने का अधिकार नहीं होगा। इस तरह ये विधेयक सिख गुरुद्वारा कानून, 1925 में सुधार करेगा। जिससे पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के गुरुद्वारा संचालित होते हैं। आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत सिंह मान ने भी इसका समर्थन किया। उन्होंने मंत्री कौर से इस मुद्दे पर बहस भी की।

3. 17 अगस्त को बदनोर बने पंजाब के राज्यपाल
चंडीगढ़। राजस्थान के कद्दावर भाजपा नेता वी पी सिंह बदनोर को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 17 अगस्त को पंजाब के साथ मणिपुर और आसाम के नए राज्यपालों के नाम पर भी अपनी मुहर लगा दी। पंजाब में राज्यपाल का पद काफी लम्बे समय से खाली चल रहा था। हरियाणा के राज्यपाल प्रो कप्तान सिंह सोलंकी के पास इसका चार्ज था। हालांकि राज्यपाल सोलंकी ने पंजाब का चार्ज तो ले लिया था। लेकिन वह हरियाणा के राज्यपाल आवास में ही रहते थे। पंजाब के राज्यपाल को लेकर काफी दिनों से कई नामों की चर्चा चल रही थी। जिसमें गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा था। इसी बीच सारी अटकलों को विराम लगाते हुए केन्द्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने पंजाब केे राज्यपाल के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा जनपद के मूल निवासी कद्दावर भाजपा नेता वीपी सिंह बदनोर के नाम पर अपनी मुहर लगा दी। पंजाब के नवनियुक्त राज्यपाल वीपी सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की विद्यार्थी जीवन से ही प्रारम्भ कर दिया था। 1975 में लगे आपातकाल के विरोध में भी वी पी सिंह बदनोर को जेल भी जाना पड़ा था। जेल से निकलने के बाद पहली बार से वर्ष 1977 में विधायक के रूप में विधायक चुने गए। वे 1985 और 1993 में विधायक और 1998 में राजस्थान सरकार में केबिनेट मंत्री भी रहे। इसकेे बाद लगातार 1999 व 2004 में लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। इस दौरान वीपी सिंह संसद के विभिन्न कमेटियों के सदस्य रहे।

4. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों से हुआ पलायन
अमृतसर। भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइल के चलते भारत पाक सीमा पर तनाव ज्यादा हो गया था और पाकिस्तान की ओर से लगातार गोलीबारी की जा रही थी। जिसके बाद भारत सरकार ने पाक सीमा से सटे अमृतसर और आसपास के दस किलोमीटर के दायरे के करीब डेढ़ सौ गांवों को खाली कराने के आदेश जारी किए थे। स्कूलों में छुट्टियां घेाषित कर दी गई थी और गांवों में सैन्य बलों को भेजा जा रहा था। दहशत के बीच ग्रामीण अपने घर और खेतों में खड़ी फसल के साथ सब कुछ छोड़कर राहत कैंपों में रहने को मजबूर हो गए थे। जिसके बाद बढ़ती परेशानी और पाक सेना की ओर से कम हुई गोलीबारी के साथ दोनों देशों की उच्चस्तरीय बैठक के बाद सरकार ने 7 अक्टूबर को गांवों को खाली करने के आदेश वापस ले लिए थे। जिससे लोगों ने भी बड़ी राहत ली।

5. पांच नबम्बर को बडूंगर फिर बने एसजीपीसी के 41वें प्रधान।
सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब विधानसभा की ओर से पारित बिल को असंवैधानिक करार दिया था।आखिरकार शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के नए प्रधान का ऐलान हो गया। सुखबीर बादल के खासमखास प्रो. किरपाल सिंह बडूंगर को एसजीपीसी का नया प्रधान बनाया गया है। इससे पहले जत्थेदार अवतार सिंह मकड़ कार्यभार संभाल रहे थे। बडूंगर को प्रधान बनाने का सबसे बड़ा कारण उनकी साफ छवि रही। पिछड़ी श्रेणी से संबंध रखने वाले बडूंगर 1997 वाली बादल सरकार में ओएसडी रह चुके हैं। इसके बाद वे एसजीपीसी के प्रधान रहे। टोहडा को हटाने के बाद इन्हें प्रधान बनाया गया था। साथ ही बलदेव सिंह क्यामपुरी को सीनियर उप प्रधान, बाबा बूटा सिंह को जूनियर उप प्रधान और अमरजीत सिंह चावला को जनरल सचिव के पद के लिए चुना गया है। शिरोमणि कमेटी सिखों की सर्वोपरि धार्मिक संस्था है। सिख राजनीति इसके इर्द-गिर्द ही घूमती है। जिस अकाली गुट का इस पर कब्जा होता है उसी गुट का सिख राजनीति में भी बोलबाला रहता है। शिरोमणि कमेटी के सदस्यों की कुल संख्या 190 है। इनमें से 170 चुनाव के माध्यम से चुनकर आते हैं, जबकि 15 सदस्यों को नामजद किया जाता है। कमेटी सदस्यों का चुनाव प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल के बाद होता है। पांचो तख्तों के जत्थेदार भी शिरोमणि कमेटी के सदस्य होते हैं। परन्तु उन्हें मत का अधिकार नहीं होता है, इसलिए कमेटी पदाधिकारियों के चुनाव में केवल 185 सदस्य ही अपने मत का प्रयोग करते हैं। पिछले दस वर्षों से अवतार सिंह मक्कड़ शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं।

6. कांग्रेस विधायकों का विधानसभा से इस्तीफा
चंडीगढ़। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पंजाब में सतलुज-यमुना लिंक नहर के मसले पर सियासत तेज हो गई है। फैसले को विरोध करते हुए 42 कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा के सचिव को अपना सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुरुवार को ही लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। विपक्ष के नेता चरणजीत सिंह चन्नी, सुनील जाखड़, सुखजिन्दर सिंह और बलवीर सिंह संधु समेत 42 विधायक शुक्रवार को विधानसभा गए और उन्होंने विधानसभा के सचिव शशि लखनपाल मिश्रा को इस्तीफा सौंप दिया। क्योंकि अध्यक्ष चरणजीत सिंह अटवाल मौजूद नहीं थे। इन विधायकों के साथ अमरिन्दर सिंह, प्रताप सिंह बाजवा और अंबिका सोनी समेत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मौजूद थे। 14 नबम्बर को मंत्रिमंडल ने एसवाईएल की भूमि को डी-नोटिफाइड करने का निर्णय किया था। बादल ने 16 को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इस पर विधानसभा की मोहर ही नहीं लगबाई बल्कि अब तक सप्लाई किए पानी की कीमत वसूलने के निर्देश भी दिलवा दिए।[@ वर्ष 2016: डोनाल्ड ट्रंप ने रचा इतिहास, विवादों के साथ बने US के 45वें राष्ट्रपति ]

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Web Title:flash back 2016 from punjab
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