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25 वर्ष पूर्व हुए अन्याय की लडाई लड़ रहे चमेरा-3 के विस्थापित

25 years ago, the battle of fighting the injustice Chamera 3 displaced - News in Hindi

चम्बा। 25 वर्ष पूर्व हुए अन्याय की लडाई लड़ रहे चमेरा-3 के विस्थापित करीब 262 परिवार जिन्होंने अपने राष्ट्र निर्माण में अपनी पैतृक भूमि जिस पर उनकी आस्था बंधी थी आहुति के तौर डाल दी थी परन्तु आज 25 वर्ष बीत जाने के उपरान्त भी यह विस्थापित दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर है। प्रधानमंत्री को दिए गए ज्ञापन में सभी 262 विस्थापित परिवारों के मुखियों ने हस्ताक्षर कर चार पन्नों में अपनी दु:ख भरी कहानी लिखी है। जिसमें इन उजड़ चुके परिवारों में चमेरा प्रथम विस्थापित के प्रधान व विस्थापित प्रभावित परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष चमन सिंह ठाकुर और अन्य ने प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन व एनएचपीसी पर आरोप लगाते हुए कहा कि चमेरा चरण-1 का काम वर्ष 1981 में प्रारम्भ हुआ और 13 वर्षों के उपरांत वर्ष 1994 में इस चमेरा चरण-1 का कार्य पूरा होते ही 550 मेगावाट बिजली का दोहन एनएचपीसी ने करना शुरू कर दिया।
विस्थापित प्रभावित परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष चमन सिंह ठाकुर और अन्य पदाधिकारियों ने एनएचपीसी के किए गए इकरारनामे के मुताबिक 6 जुलाई 1985 में की गई एक बैठक जिसमें जिला प्रशासन और परियोजना प्रबंधक की एक अह्म बैठक में यह लिखित रूप में तह किया गया कि जिन लोगों की भूमि 50 प्रतिशत या उससे अधिक अधिग्रहण में जाएगी उन विस्थापित परिवार के एक सदस्य को इस परियोजना में नौकरी दी जाएगी व जमीन का उचित मुआवजा भी दिया जाएगा। इन लोगों ने एनएचपीसी प्रबंधन पर गैर जिम्मेदाराना कागजी कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए कहा कि परियोजना प्रबंधन ने कुछ वर्ष बाद जिलाधीश चम्बा की अनुमतिध्और बिना मंजूरी के 400 उन लोगों को नौकरी के साथ-साथ जमीन का मुवावजा भी दे दिया जोकि न तो इस क्षेत्र के थे और न ही विस्थापित और प्रभावित हुए थे ही। इन लोगों ने 192 ऐसे परिवारों का खुलासा किया कि इन लोगों की पहुंच राजनैतिक खलियारो में तो थी ही साथ में प्रशासन पर भी इनकी पकड़ थी जिसके चलते वर्ष 1986 में इन चुनिंदा लोगों को नौकरियां दे दी गई परन्तु इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह कि परियोजना प्रबंधन ने उन 145 लोगों के साथ भी एक समझौते के तहत उनको नौकरी दे दी गई, जिनकी सम्पति का अदिग्रहण हुआ ही नहीं था।
बाकि के बचे 45 में से 30 वह व्यक्ति थे जिनकी 1 या फिर 2 बिस्वा जमीन इसमें अधिग्रहण हुई थी जबकि हम लोगों की 50 प्रतिशत या उससे अधिक अधिग्रहण भूमि इस परियोजना में चली गई है पर परियोजना प्रबंधन ने हम लोगों के साथ अन्याय करते न तो हमें नौकरियां दी और न ही उचित मुवावजा। लिखे ज्ञापन में इन विस्थापितों ने देश के प्रधानमंत्री से कड़ी गुहार लगाई है की जो व्यक्ति देशहित के कार्य में अपनी पैतृक सम्पति को दे सकते है आखिर उन्हें तो कुछ भी हासिल नहीं हुआ है पर राजनीतिक पकड़ रखने वालों की सरकार भी मदद करती है और प्रशासन भी। यह कब तक चलेगा क्या हम लोग राजनैतिक चक्की में यूं ही पिस्ते रहेंगे।

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Web Title:25 years ago, the battle of fighting the injustice Chamera 3 displaced
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