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हिन्दी मीडियम: भारतीय शिक्षा तंत्र पर करारा प्रहार

फिल्म समीक्षा
कलाकार: इरफान खान, सबा कमर, दीपक डोबरियाल, अमृता सिंह
निर्देशक: साकेत चौधरी
संवाद लेखक : अमितोष नागपाल
निर्माता: दिनेश विजन, गुलशन कुमार

फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी, प्यार के साइड इफेक्ट्स और शादी के साइड इफेक्ट्स जैसी व्यंग्यात्मक फिल्में बना चुके लेखक निर्देशक साकेत चौधरी की ‘हिन्दी मीडियम’ मध्यवर्ग की विसंगतियों को छूती फिल्म है, जिसके विषय से सभी वाकिफ हैं, लेकिन कोई इस पर बातें नहीं करता। हिन्दी मीडियम के जरिये साकेत चौधरी ने समाज को एक खास संदेश देने की कोशिश की है, जिसमें वह काफी हद तक सफल हुए हैं। मजाकिया अंदाज में उन्होंने देश की भाषा समस्या को उठाया है। भारत में अंग्रेजी के बढते वर्चस्व को दर्शाती यह फिल्म कहती है कि अपनी जडों को मत भूलो। दूसरी भाषा सीखना अच्छी बात है लेकिन उसे इतना मत अपनाओ की अपनी मातृ भाषा को ही गाली देना शुरू करो। भारत में अंग्रेजी भाषा ने किस तरह से अपने पैर पसारे हैं इससे सभी वाकिफ हैं। इसमें हमारा नहीं बल्कि सरकार का दोष ज्यादा है जिसने हिन्दी को भूल कर अंग्रेजी को अपनाया और आज वहीं अंग्रेजी भारत की मूल भाषा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। अंग्रेजी की हिमायत करने वालों के पास अनेक बेबुनियादी तर्क हैं। हिंदी के खिलाफ अन्य भाषाओं की असुरक्षा अंग्रेजी का मारक अस्त्र है। अंग्रेजी चलती रहे। हिंदी लागू न हो। इंग्लिश पब्लिक स्कूलों के अहाते बडे होते जा रहे हैं और हिंदी मीडियम सरकारी स्कूल सिमटते जा रहे हैं। हर कोई अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम में डालना चाहता है। सरकार और समाज के पास स्पष्ट और कारगर शिक्षा व भाषा नीति नहीं है।

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