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जानें, कुयोग में जन्मी संतान के लिए क्यों आवश्यक है जनन शांति

जनन शांति ज्योतिष, फलित ज्योतिष एवं धर्म शास्त्र के संयोग से बना एक उलझनपूर्ण परिच्छेद है। इस विषय में अनेक ग्रंथों में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त होती है। प्रारंभ में समाज के बहुतायत लोगों की जनन शांति में रूचि नहीं रहती। लेकिन जब संतति में कोई बिगाड या विकृति होती है तब ज्योतिषी की सलाह ली जाती है। ज्योतिषी सर्वप्रथम तत्कालीन ग्रहों की इष्टता-निष्टता देखकर उसमें कोई त्रुटि न पाने पर जन्मतिथि जांचता है। उसमें भी कोई दोष न मिलने पर वह जनन शांति को दोष बताता है।

कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, अमावस्या, क्षयतिथि, अश्विनी नक्षत्र की पहली घटी (48 मिनट), पुष्य नक्षत्र का दूसरा एवं तीसरा चरण आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा का तीसरा चरण, रेवती नक्षत्र की आखिरी दो घटी (48 मिनट), व्यतीपात, वैधृति, भद्रा योग तथा ग्रहण काल इत्यादि कुयोगों में जन्मी संतति की जनन शांति आवश्यक होती है। अनेक ग्रंथों में इन कुयोंगों में जन्मी बालक को विभिन्न कष्ट होने तथा माता-पिता पर घोर विपत्ति आने का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। इसके अलावा अनेक कुयोगों में जन्मे बालक का जन्म किस तरह अशुभ सूचक है, इसका भी उल्लेख हुआ है।

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Web Title-why worshiping women before birth of children
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Tags: why worshiping women before birth of children, birth of children, celebration of children birth, janan shanti poojan, astrology, astrology in hindi
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