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लोकसभा चुनाव में नए उम्मीदवारों के लिए 'RSS' ने इस तरह बनाई थी रणनीति

Madhya Pradesh:For the new candidates in the Lok Sabha elections, the RSS has created such a strategy - Delhi News in Hindi

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश के परिणाम हर किसी के लिए चौंकाने वाले थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने यहां की 29 में से 28 सीटें जीत ली और कांग्रेस किसी तरह एक सीट जीतने में कामयाब हो पाई। भाजपा की इस भारी जीत के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने खास रणनीति बनाई थी, जो पूरी तरह सफल हुई। दरअसल, टिकट बंटवारे के बाद भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ राज्य में जो असंतोष सामने आया था, उसे देखकर हर किसी को लगा था कि पार्टी को लोकसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है। कई स्थानों पर कार्यकर्ता उम्मीदवारों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन संघ की रणनीति सभी विपरीत हालातों पर भारी पड़ी। राज्य में भाजपा को 29 में से 28 सीटों पर जीत मिली है।

वहीं कांग्रेस सिर्फ छिंदवाड़ा सीट किसी तरह बचा पाई है। लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने और उसके बाद उम्मीदवारों के नामों की घोषणा से राजनीतिक पंडित अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि भाजपा को इस तरह और इतनी बड़ी सफलता मिलेगी। लेकिन भाजपा ने राज्य में नया इतिहास रचने में कामयाबी हासिल की। संघ से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भगवा संस्था ने सबसे ज्यादा जोर भोपाल में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, खजुराहो में वी. डी. शर्मा, इंदौर में शंकर लालवानी, उज्जैन में अनिल फिरोजिया, बैतूल में दुर्गादास उईके, रतलाम में जी. एस. डामोर, ग्वालियर में विवेक शेजवलकर के लिए लगाया।

इसके अलावा संघ ने देवास में महेद्र सिंह सोलंकी, मंदसौर में सुधीर गुप्ता, खरगोन में गजेंद्र पटेल और धार में छतर सिंह दरबार के लिए खास रणनीति बनाई। संघ से संबद्घ एक नेता ने नाम न छापने के अनुरोध के साथ बताया, "संघ ने जिन स्थानों पर अपनी पसंद के उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, उनमें से कई स्थानों पर स्थानीय नेताओं ने विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही उम्मीदवारों के खिलाफ माहौल बनाने का हर संभव प्रयास किया। इन स्थितियों से निपटने के लिए संघ के जिम्मेदार पदाधिकारियों को संबंधित क्षेत्रों में सक्रिय किया गया। बैठकों का दौर चला, असंतुष्टों को समझाया गया, साथ ही चुनाव बाद गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहने की हिदायत दी गई।

नेता ने आगे बताया कि उम्मीदवारों के नामों का ऐलान होने के बाद कई बड़े असंतुष्ट नेता घरों में बैठ गए थे। इन नेताओं पर नजर रखने के लिए संघ ने खास रणनीति बनाई। बड़े नेताओं के घरों पर संघ से जुड़े एक-एक व्यक्ति को ठहराया गया, जिसके चलते बगावत पर उतरे नेताओं पर काबू रखना आसान हो गया। असंतुष्टों को मजबूरी में सुबह से पार्टी के लिए प्रचार करने घर से निकलना पड़ता और घर में भी वे पार्टी के लिए काम करने को मजबूर होते। सूत्रों के अनुसार, संघ के लिए सबसे बड़ी चुनौती भोपाल संसदीय क्षेत्र में थी, क्योंकि यहां भाजपा ने संघ के निर्देश पर ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा था। प्रज्ञा जहां हिंदूवादी चेहरा थीं, वहीं उनका मुकाबला कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से था।

दिग्विजय की पहचान हिंदू विरोधी और हिंदुओं को आतंकवाद से जोड़ने वाले नेता की रही है। एक सूत्र ने बताया कि इस स्थिति में अगर भाजपा भोपाल में हारती तो पूरे देश में जो संदेश जाता, उसे मिटा पाना भाजपा और संघ के लिए आसान नहीं होता। यहां संघ ने एक विशेश अभियान चलाया, जिसमें संघ से जुड़े नेताओं ने असंतुष्टों के घरों में डेरा डालकर अलग-अलग घर में पहुंचकर नियमित रूप से भोजन किया। यहां ध्रुवीकरण करना संघ का लक्ष्य था और उसमें वह सफल भी हुई। भाजपा सूत्रों के अनुसार, संघ की खास दिलचस्पी पर ही खजुराहो संसदीय क्षेत्र से वी. डी. शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा गया था। शर्मा को पहले भोपाल, फिर विदिशा और उसके बाद मुरैना से उम्मीदवार बनाने की बात आई तो स्थानीय नेताओं ने विरोध किया। लेकिन संघ के साफ निर्देश थे कि शर्मा को इस बार चुनाव लड़ाना है। इस पर पार्टी ने उन्हें खजुराहो भेजा तो वहां भी शर्मा का खूब विरोध हुआ। कई जगह पुतले फूंके गए, लोग विरोध में सड़कों पर उतरे। उसके बाद संघ ने शर्मा के पक्ष में माहौल बनाने की कमान संभाली। संघ से जुड़े लोगों ने इस संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा क्षेत्रों में डेरा डाला। राजनीतिक विश्लेषक रवींद्र व्यास कहते हैं, "भाजपा के लिए हर चुनाव में संघ अपने तरीके से काम करता है। राज्य में इस बार के चुनाव में भाजपा की सरकार नहीं थी, लिहाजा संघ की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा थी। इसके अलावा संघ की मर्जी के उम्मीदवार भी मैदान में उतारे गए थे। इसलिए संघ को पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार जोर भी ज्यादा लगाना था।

व्यास ने कहा कि संघ की साख तो भोपाल में दांव पर थी और उसने यहां भाजपा को जिताकर साबित कर दिया है कि वह किसी उम्मीदवार के लिए प्रण-प्राण से लग जाए तो जीत आसान हो जाती है। प्रज्ञा नया चेहरा थीं और कई तरह के आरोपों से घिरी थीं, फिर भी जीत गईं। खजुराहो में शर्मा का भाजपा नेताओं ने भरपूर विरोध किया, मगर संघ की घर-घर में घुसपैठ उन्हें चुनाव जिता ले गई।" संघ के सूत्रों के अनुसार, संघ ने राज्य की एक दर्जन सीटों पर खास भूमिका निभाई और इन क्षेत्रों में 30 हजार से ज्यादा स्वयंसेवकों को पर्दे के पीछे रखकर अभियान चलाया। संघ ने सामान्य वर्ग की सीटों से लेकर आरक्षित वर्ग की सीटों पर भी अपने अन्य अनुशांगिक संगठनों के जरिए जमीन तैयार की। चुनाव की तारीख के ऐलान से लेकर मतदान की तारीख तक संघ के स्वयंसेवक पूरी मुस्तैदी से लगे रहे और उनकी मेहनत रंग लाई। (आईएएनएस)

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