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15 जनवरी को सूर्यग्रहण |
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15 जनवरी, 2010, माघ कृष्णा अमावस्या, शुक्रवार को सूर्यग्रहण होगा जो कि भारत के अधिकांश शहरों में खण्डग्रास दिखाई देगा। कंकणाकृति का यह ग्रहण भारत सहित उत्तर-पूर्वी प्रशान्त महासागर, संपूर्ण एशिया महाद्वीप, मध्य ...... आगे पढें |
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बृहस्पति को गुरू क्यों कहते हैं ! |
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खगोल शास्त्र और ज्योतिष में सौरमंडल के नौ ग्रहों में सूर्य सहित शुक्र और बृहस्पति आते हैं। सप्ताह के सात दिनों का नामकरण में भी इन तीनों से तीन दिनों का नाम जु़डा हुआ है। आगे पढें |
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बृहस्पति के नक्षत्र |
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बृहस्पति के नक्षत्र व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर संचार कर रहे होते हैं वह उसका जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र का प्रभाव व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार पर पूर्ण रूप से प़डता है आगे पढें |
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बृहस्पति की राशिया |
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व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि पर होते हैं, वह व्यक्ति की जन्म राशि होती है। संपूर्ण भचक्र को 12 राशियों में विभक्त किया गया है। सूर्य व चंद्रमा को एक-एक राशि का तथा मंगल, बुध... आगे पढें |
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आकर्षक व्यक्तित्व का दर्पण - गुरू पर्वत |
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गुरू पर्वत : पहली अंगुली जिसे तर्जनी अंगुली भी कहा जाता है के मूल में मस्तिष्क रेखा, हाथ के पाश्र्व से पहली और दूसरी अंगुली के बीच सीधे ऊपर-नीचे मस्तिष्क रेखा तक जाने वाली काल्पनिक रेखा ... आगे पढें |
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कुंभ पर्व और बृहस्पति |
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भारत में हरिद्वार,प्रयाग, नासिक और उज्जैन में कुंभ पर्व का आयोजन देवगुरू बृहस्पति और सूर्य व चंद्रमा की राशि विशेष में स्थिति के आधार पर होता रहा है। ... आगे पढें |
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बृहस्पति के विषय |
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चौ़डा ललाट अच्छे भाग्य की निशानी माना जाता है तथा उन्नत चौ़डा ललाट बृहस्पति देव का ही विषय क्षेत्र है। जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर बृहस्पतिदेव का अधिकार है, जैसे- शिक्षा, विवाह, संतान,... आगे पढें |
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गुरू भारतीय संस्कृति में |
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देवगुरू बृहस्पति की गरिमा भारतीय संस्कृति, पौराणिक वाङ्मय और सांस्कृतिक मान्यताओं में जितनी रची बसी है, उतनी ही ज्योतिर्विज्ञान और खगोल में भी है। इसमें तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए ... आगे पढें |
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गुरू चाण्डाल योग |
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बृहस्पति और राहु जब साथ होते हैं तो गुरू चाण्डाल योग बनता है। चाण्डाल का अर्थ निम्नतर जाति है। चाण्डाल का कार्य श्मशान भूमि के आसपास ही सीमित रखा गया था। ... आगे पढें |
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बृहस्पति और मोटापा |
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बृहस्पति आशावाद के प्रतीक हैं, गुरू हैं, ग्रह हैं तथा देवताओं के मुख्य सलाहकार हैं। वे उपदेशक हैं, प्रवाचक हैं तथा सन्मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं। आगे पढें |
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सप्तपुरियां |
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शास्त्रों में मुक्ति के पाँच प्रकार बताए हैं- प्रथम ब्रम्ह ज्ञान, द्वितीय भक्ति द्वारा भगवत्कृपा की प्राप्ति, तृतीय पुत्र-पौत्रादि, गौत्रजों, कुटुम्बियों तथा अन्य आगे पढें |
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पुराने शब्द नये समीकरण |
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शास्त्रों में बहुत सारे ऎसे शब्द हैं जिनके आधुनिक अर्थो की जानकारी अति आवश्यक है। बहुत सारी प्राचीन व्यवस्थाएं आज प्रचलन में नहीं रही हैं। आगे पढें |
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अद्भुत हैं राहुदेव |
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भारत ही वह देश है जहाँ सर्प को देखकर हाथ जो़डे जाते हैं। देवता के रूप में उसकी प्रतिष्ठा की जाती है, जिसका प्रमाण नागपंचमी का पर्व है। आगे पढें |
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कार्तिक व्रत के नियम व उद्यापन की विधि |
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कार्तिक मास के अंतर्गत जो पुरूष व स्त्री व्रत पारायण होते है, उन्हें अन्नदान करना चाहिये, गायों को हरा चारा अथवा धान्य का दान, आगे पढें |
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लक्ष्मीपति तिरूपति-बालाजी |
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भारत का सबसे धनी और संसार के सबसे धनी मंदिरों में आंध्रप्रदेश में तिरूपति नामक स्थान पर भगवान विष्णु (वैंकटेश) का मंदिर है। आगे पढें |
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पद्मालक्ष्मी |
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लक्ष्मी का एक नाम पद्मा भी है। श्री सूक्त में माता लक्ष्मी के लिए पद्मस्थिता पद्मवर्णा पद्मिनी, पद्मालिनी पुण्करणीं, पद्मानना मद्मोरू, आगे पढें |
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धन की अधिष्ठात्री देवी "लक्ष्मी" |
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धन-सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी का नाम "लक्ष्मी" है। देवताओं और राक्षसों ने मिलकर समुद्र-मंथन किया तो चौदह रत्नों में एक लक्ष्मी भी प्राप्त हुई। आगे पढें |
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धनदायक वस्तुएं |
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प्रकृति अपने में असंख्य निधियों को समेटे हुए है, जिसको इनका ज्ञान है, वह लाभ उठाता है। ऎसी बहुत सी वस्तुएं हैं जो सुख-समृद्धि के प्रभावों से ओत-प्रोत हैं। आगे पढें |
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पीपल और शनि |
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शनिवार को पीपल पर जल व तेल चढाना, दीप जलाना, पूजा करना या परिक्रमा लगाना अति शुभ होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन है कि पीपल पूजा केवल शनिवार को ही करनी चाहिए। आगे पढें |
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शनि की साढेसाती के अशुभ फलों के उपाय |
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शनिदेव वही शिक्षक हैं जो कष्ट की कसौटी पर व्यक्ति को परखते हैं, मजबूत बनाते हैं और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करने में अहम भूमिका निभाते है आगे पढें |
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शनि और रावण |
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आसुरी संस्कृति में महान् व्यक्तित्व उत्पन्न हुए, जिनका बल-पौरूष और विद्वत्ता अतुलनीय रही थी। शुम्भ-निशुम्भ, मधु-कैटभ, हिरण्यकश्यप, बलि या रावण, सभी अतुल पराक्रमी और महा विद्वान थे। आगे पढें |
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शनि और श्रीगणेश जी |
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श्रीगणेश जी का धड भाग तो मनुष्य का है किन्तु मस्तक (कंठ के ऊपर का भाग) हाथी का है और वे नागानन या गजानन कहलाते हैं। गणेश जी का मस्तक हाथी का ही क्यों है..... आगे पढें |
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काले घोडे की नाल |
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शनि को लोहा प्रिय है, किन्तु शनिवार को लोहा घर में नहीं लाया जाता। जिस धातु को शनि सर्वाधिक पसंद करते हैं, उसी धातु का घर में शनिवार को आना पीडादायक और कलहकारक सिद्घ होता है। आगे पढें |
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क्रांतिकारी शनि |
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कोयले और हीरे के रासायनिक संयोजन में कोई अंतर नहीं होता, परन्तु दाब और ताप अधिक होने पर कोई कोयला, हीरे में परिवर्तित हो जाता है। ऎसे ही हैं शनिदेव और जन्मपत्रिका में उनकी स्थिति भी ऎसे ही परिणाम देने वाली होती है। आगे पढें |
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गणपति पूजन में तुलसी निषिद्ध क्यों |
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मनोहारिणी तुलसी समस्त पौधों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें समस्त पूजन कर्मो में प्रमुखता दी जाती है साथ ही मंदिरों में चरणामृत में भी तुलसी का प्रयोग होता है तथा ऎसी कामना होती है कि यह अकाल मृत्यु को हरने वाली तथा सर्व व्याधियों का नाश करने वाली हैं परन्तु यही पूज्य तुलसी देवों को भगवान श्री गणेश की पूजा में निषिद्ध मानी गई हैं। आगे पढें |
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देश में ही नहीं विदेशों में भी है स्वास्तिक की गरिमा |
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स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बडा महत्व है। " सिद्धान्तसार " के अनुसार इसे ब्रम्हाण्ड का प्रतीक माना जाता है। इसके मघ्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रrााजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित करने की भावना है। आगे पढें |
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राधा-कृष्ण विवाह |
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हम में से बहुत से लोग यही जानते हैं कि राधाजी श्रीकृष्ण की प्रेयसी थीं परन्तु इनका विवाह नहीं हुआ था। श्रीकृष्ण के गुरू गर्गाचार्य जी द्वारा रचित "गर्ग संहिता" में यह वर्णन है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था। एक बार नन्द बाबा कृष्ण जी को गोद में लिए हुए गाएं चरा रहे थे। आगे पढें |
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राधा तू बडभागिनी |
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राघाजी भगवान श्री कृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बरसाना के श्री वृषभानु जी के यहां राघा जी का जन्म हुआ था। श्रीमद्देवी भागवत में कहा गया है कि श्री राघा जी की पूजा नहीं की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अघिकार भी नहीं रखता। आगे पढें |
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जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है |
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कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई जोखिम नहीं लेते है, तो वह अपने-आपमें सबसे बडा जोखिम है। यह सही भी है कि ज्यादातर लोग जोखिम लेन से डरते है। इसकी कई वजहें होती है, लेकिन जो सबसे बडी वजह है, वह संकल्प और विचार शक्ति की कमी है। आगे पढें |
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जीवन का सार |
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पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, "ओह, मैं कितनी अकेली हूं् ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुघ नहीं लेता।" आगे पढें |
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