मनोरंजन के साधन: नये पुराने

विशेष संपादकीय : सपना मिश्रा

अब दुनिया के साथ लोगों और समाज के मनोरंजन के साधन भी बदल रहे है। अन्तर यह है कि पहले दाम नही लगते थे या बहुत कम लगते थे पर कोई जरा सा भी नुकसन नही होता था। आज के जमाने में पैसे तो खर्च होते ही है, नुकसान भी होता है। वैज्ञानिक युग में मोबाइल, लेपटाप, कम्यूटर सिनेमा , टीवी रेडियो सब महंगे उपकरण है। थोडा कम या ज्यादा प्राचीन भारतीय सभ्यता संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहे है, और सामाजिक प्राणी माने जाना वाला इन्सान एकाकी, आत्मकेन्द्रित, महास्वार्थी और एकल परिवार हो रहे है। क्लब पब, बार में नशा हावी है। और तो और दिन भर की भागदौड की थकान रोज के तनाव को हल्का करने के लिए नशे की लत ऎसे पीछे पडती है कि जान लेकर ही पीछा छोडती है। आये दिन के सभा समारोह शोर गुल हो हल्ला, बन्द आन्दोलन धरना मनशन एक तरफ तनाव बढा रहे है, तो बन्द मकान में टीवी से चिपका परिवार, वह देखने सुनने पर मजबूर है जो रचनात्मक सृजनात्मक शाक्ति और ऊर्जा को तो क्षति पहुंचाता है सेक्स, हिसा, मारध़ाड, लडाई झगडो के सन्देश का वाहक है। तभी तनाव व्याप्त है तो स्वस्थ मनोरंजन की नितांत आवश्यकता है।
पहले गांव चौपाल मे गप्प सप्प, एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछने से मन का बोझ हल्का हो जाता था। आज हाय, हलो के आगे हाउ आर यु और फाइन के जवाब से तमाम दुखदर्द टीस कसक पीडा मन हही मन मे रह जाती है। गांव के मेले तमाशे पूजा अर्चना व्रत त्यौहार के अलावा बच्ची को शादी से कई दिनो पहले से शुरू हो जाने वाले बना बनी के लोकगीत सूकून देते थे। आज गरबा में सीखने शामिल होने की फीस लगती है। हर हफ्ते मरने वाले बाजार हार, बन्दर, भालू का तमाशा और जादू की बाजीगरी , छोटे छोटे नन्हे भोले मासूम बच्चो की जिमनास्टिक सर्कस से मिलती जुलती कसरते लोगो को दांत तले अंगुली दवाने पर मजबूर कर देती थी हफ्तो पखवाडो महिनो तक चलने वाले कथा, भगवत रामायण, महाभारत के पाठ, रामलीला और रासलीली के रोमांचक अद्भूत आकर्षक नजारो का इन्तजार भोर की पहली किरण से ही होने लगता था। आजादी के साथ सिनेमा का चलन शुरू हुआ तो पहले बिना बोलने वाली काली सफेद आदम कद तस्वीरे फिर रंगीन और अब थ्री डी ।। महानगरो शहरों कस्बो में टेन्टो टीन के टापरो, इरüट की दीवारों मे कुछ पैसो मे फिल्म शो शुरू हुए तो गांव ढाणी के लोग तीर्थ यात्रा की तरह एक होकर इकट्टे सिनेमा जाते थे और गली मुहल्लो खेत खलिहानो में हफ्तो फिल्मी चर्चे चलते थे। प्रचार प्रसार के लिए जब गांव ढाणी में सरकारी जीपे जाने लगी तो बिजली, जनरेटर से सरकारी योजनाओं के साथ शिक्षप्रद पारिवारिक सामाजिक फिल्मे निशुल्क दिखाई जाती थी और ग्रामीण भी फिल्म दिखाने वालो को बिना चाय नाश्ते भोजन के विदा नही करते थे। फिर अमीरो के बंगलो में काले सफेद टीवी आ गये और अब आदमी के घर में रंगीन टीवी और डिश कन्शेसन जो समाचार कम कदाचार ज्यादा उमलता है। बच्चो बçच्चायो के एक साथ बैढकर देखना दुष्कर है।
इसी तरह धीर गंम्भीर रेडियो के साथ अब दिन रात चलने वाले रेडियो चैनलो मे विज्ञापन के साथ अटपटे गानो और उद्द्योषक की कभी ना खत्म होने वाली ऊबाउ चर्चा के बीच छोटी मोटी गिफ्ट का लालच भी रहता है, और तो और ईपी के चलन से एक सिनेमा हाल में कई फिल्मो का लुत्फ उटाया जा सकता है। पर जादूगरी और सर्कस का दौर समाप्त होने के कगार पर है। महिलाऎ किटी पार्टी मे आनंद लेने लगी है तो एकल परिवार वीकएण्ड सेलीबेट करने लगे है। पानी के साथ पिकनिक और हरियाली के साथ गोट का रिवाज आखरी सांसे ले रहा है। बच्चो को पढाई टयूशन से, बेरोजगारो को नौकरी की तलाश से नौकरी पेशाओ को अफसरो की जी हूजूरी से, व्यापारियों को मिलावट एव मुनाफा खोरी से किसान मजदूरो को खाद बीज खेत खलियानो से ही फुरसत नही है, तो कहां का कैसा स्वस्थ्य मनोरंजन। यही सब कारण है कि मानसिक रोगी बढ रहे है हर आयुवर्ग के स्त्री पुरूष आत्महत्या करने को मजबूर है। तलाको के मामले बढ रहे है। दादा दादी नाना नानी परेशान है।
कारण सिर्फ इतना है कि शांति सकून अमन चैन संतोष नही है। इसीलिए मनोरंजन अर्थात मन को चिन्ता फ्रिक से अलग कर चन्द लम्हो के लिए ही सही आराम विषय परिवर्तन की जरूरत है। हल्का गीत संगीत लतीफे बाजी से भी मनोरंजन होता है।
लेखक हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है

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