भ्रष्टाचार पर लगाम की अहम शुरूआत

विशेष संपादकीय :

सुप्रीमकोर्ट ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा द्वारा 2008 में जारी 2-जी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं। शीर्ष अदालत के आदेश हैं कि अब 2-जी स्पेक्ट्रम का आवंटन नए सिरे से, नीलामी के जरिए हो। अदालत का ये फैसला अचरज पैदा नहीं करता क्योंकि शुरू से ही इस घोटाले की जांच और अदालती सुनवाई जिस दिशा में बढ रही थी उससे तय था कि फैसला ऎसा ही कुछ होगा।

राजनीतिज्ञों और व्यापारियों की साठगांठ देश में यूं तो वर्षो से चली आ रही है लेकिन जागरूकता के मौजूदा दौर में सामने आया 2-जी घोटाला और गुरूवार को आया फैसला बताता है कि लोकतंत्र में जनता,मीडिया और न्यायपालिका मिलकर ही धनपतियों व राजनेताओं की कुचेष्टाओं को रोक सकते हैं। >> ये फैसला उस दिन आया जिस दिन शीर्ष अदालत के जस्टिस एके गांगुली सेवानिवृत्त होने थे और अपने अंतिम कार्यदिवस पर उन्होंने जस्टिस जीएस सिंघवी के साथ जो फैसला सुनाया> वह न्यायपालिका ही नहीं वरन हमारे लोकतंत्र के इतिहास में दीर्घकालीन प्रभावों वाला निर्णय माना जाता रहेगा।

ये सच है कि 122 लाइसेंस रद्द करने से देसी-विदेशी कंपनियों> के साथ ही करीब साढे चार करोड ग्राहकों को परेशान होना पडेगा। जहां तक ग्राहकों का सवाल है, उन्हें नए विकल्प सुलभ हो जाएंगे लेकिन सेवा प्रदाता कंपनियों को ज्यादा परेशानियां आएंगी, खासकर विदेशी कंपनियां भारत में निवेश के माहौल पर सवाल खडे करने से नहीं चूकेंगी। नॉर्वे की कंपनी ने तो अपना रोष जाहिर भी कर डाला है। यहां इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि किसी चुनींदा सरकार के नीतिगत फैसले को देश की दूसरी संस्था खारिज कर दे तो इसे कार्यपालिका के कर्तव्यों में न्यायपालिका का दखल भी कहा जा सकता है।

लेकिन, देश की ही कंपनियों की बात करें तो अब ये साफ है कि भ्रष्टाचार या निजी रिश्तों के जरिये सरकार के फैसलों को प्रभावित करने में उद्योगपतियों को थोडा सोचना पडेगा। जिस तरीके से उद्योगपति, अफसर और नेताओं की साठगांठ ने सारे नियम-कायदे ताक पर रख दिए, अदालत ने उन्हें सीधे तौर पर बेनकाब कर दिया है। ए राजा ने गलत तरीके से अपने खास लोगों को तरजीह दी जिससे देश को राजस्व का नुकसान हुआ लेकिन कुछ कारोबारियों को अनाप-शनाप लाभ मिला। जिन कंपनियों को ये लाइसेंस मिले व अब रद्द हो रहे हैं उन्हें अब नए सिरे से नीलामी में भाग लेना होगा लेकिन, इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। गलत काम किए हैं तो नतीजे भी भोगेंगे।

सरकार के लिए ये गनीमत रही है कि इस मामले पर अदालत ने अपनी निगरानी में एसआईटी गठन से मना कर दिया और सीबीआई के काम पर निगरानी का दायित्व मुख्य सतर्कता आयुक्त को सौंपा है। ए राजा पर केस दायर करने में देरी के लिए पीएमओ को दोषी ठहराया लेकिन प्रधानमंत्री को संदेह का लाभ दिया है।

  गठबंधन के कथित अधर्म में फंसी डॉ मनमोहन सिंह की सरकार इस मामले पर चारों ओर से घिरी रही है और अदालती फैसले ने उसकी खासी किरकिरी कर दी है लेकिन न्यायपालिका ने अपनी भूमिका निर्णायक तरीके से निभाकर देश में एक नजीर कायम की है। इस निर्णय की पृष्ठभूमि में अब उम्मीद ही की जा सकती है कि भविष्य में कोई भी मंत्री अपनी मनमर्जी से नीतियों व प्रक्रियाओं को बदलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। भ्रष्टाचार पर लगाम की दिशा में ये एक अहम शुरूआत है।  

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