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समीक्षा: सच्ची घटनाओं पर बनी काल्पनिक फिल्म है स्ट्राइकर
06    फरवरी ,  2010

निर्माता: चंदन अरोडा
 निर्देशक: चंदन अरोडा
संगीत निर्देशक: शैलेंद्र बरवे, अमित त्रिवेदी, विशाल भारद्वाज
कलाकार: आदित्य पंचोली, आर सिद्धार्थ, पद्मप्रिया, अनुपम खेर, अंकुर विकाल, सीमा विश्वास

समीक्षा: स्ट्राइकर में हिंदी फिल्मों का सभी मसाला यानी प्रेम, अपराध और हिंसा का पूरा मसाला मौजूद है और इस मसाले का स्लम की जिंदगी में पिरोया गया है। कहानी का नायक सूर्या (सिद्धार्थ) इस स्लम में रहने वाला एक नौजवान है। सूर्या अपने फैसलों और विवेक से अपराध की परिधि पर घूमने और स्वाभाविक मजबूरियों के बावजूद हालात से हार नहीं मानता। वह मुंबई की मलिन बस्ती का नायक है। हिंदी फिल्मों में मुंबइया निर्देशकों ने ऎसे चरित्रों से परहेज किया है। मलिन बस्तियों की जिंदगी में ज्यादातर दुख-तकलीफ और हिंसा-अपराध दिखाने की प्रवृति रही है। स्ट्राइकर इस लिहाज से भी अलग हैं।
सूर्या मुंबई के मालवणी स्लम में रहता है। हालांकि उसका परिवार शहर के किसी और इलाके से आकर यहां बसा है। बचपन से अपने भाई की तरह कैरम का शौकीन सूर्या बाद में इस खेल का महारथी बन जाता है। कैरम के स्ट्राइकर पर उसकी उंगलियां ऎसी सधी हुई है कि वह आमतौर पर स्टार्ट टू फिनिश गेम खेलता है। सूर्या की इस खूबी का इस्तेमाल स्थानीय अपराधी सरगना जलील अपने फायदे के लिए करना चाहता है, लेकिन सूर्या उसके दबाव और लालच से खुद को बचाए रखता है। सूर्या की जाएद से दोस्ती है। कमाई के लिए सूर्या को छोटे-मोटे अपराध करने में कोई हिचक नहीं है। दोनों दोस्त एक दूसरे की मदद किया करते हैं।
कहानी 15 साल का सफर करते हुए सूर्या के अतीत का भी सफर कराती है। परिवार से उसके संबंध आत्मीय और चिंताओं से भरे पडे हैं। बाबरी मस्जिद ढहने के बाद मुंबई में हुए दंगों के बीच मालवणी बेहद संवेदनशील इलाका माना जा रहा था। पुलिस और प्रशासन की निगाह टिकी हुई थीं। चूंकि मालवणी में मुस्लमानों की तादाद लगभग 90 फीसदी थीं, इसलिए यह आशंका व्यक्त की जा रही थीं कि हिंदू दंगों के शिकार हो सकते हैं। तनाव के इस माहौल में सूर्या जैसे चरित्रों ने मालवणी को महफूज रखा। फिल्म में जलील दंगा भडकाने के नापाक इरादे से अपनी जुगत में लगा है। तभी नाटकीय तरीके से सूर्या का आगमन होता है और मुंबई भारी तबाही से बच जाती है। हम ऎसे किरदारों के किस्सों से वाकिफ नहीं हो पाते। स्ट्राइकर मालवणी की सच्ची घटनाओं पर बनी काल्पनिक फिल्म है।
सिद्धार्थ ने स्क्रिप्ट की डिमांड से अपने लुक में बदलाव किया है। यह फिल्म उनके सशक्त अभिनय को दिखाती है। रंग दे बसंती में सहायक किरदार निभाने वाले सिद्धार्थ ने इस फिल्म में अपनी प्रतिभा की बानगी दिखाई है। उनके साथ जाएद की भूमिका में अंकुर विकल ने बराबर का साथ दिया है। आदित्य पंचोली बदले अंदाज में असर छोडने में कामयाब रहे है। उन्होंने जलील के किरदार को संयत तरीके से निभाया है।
 निर्देशक चंदन अरोडा ने फिल्म को सजीव करने का हर संभव प्रयास किया है। उन्होंने स्लम की जिंदगी को उसकी धडकनों के साथ कैमरे में कैद किया है। नौवे दशक की मुंबई के परिवेश को गढने में चंदन ने छोटे डिटेल पर भी ध्यान दिया है।
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और गीत-संगीत उल्लेखनीय है। चंदन ने अनेक संगीतकारों की मदद ली है। स्वानंद किरकिरे और विशाल भारद्वाज ने अपने संगीत से फिल्म के मूल भाव को गहराई दी हैं।

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Kangaroo Tara Reid Danielle Lloyd
 
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