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आयोध्या पर हाईकोर्ट बेंच के जजों में भी विवाद, एक और फैसला आया

आयोध्या पर  हाईकोर्ट बेंच के जजों में भी विवाद, एक और फैसला आया

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published: 20/09/2010 | 06:41:47 IST

लखनऊ। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की विशेष पीठ के जजों में भी विवाद 24 तारीख को फैसला आने से पहले ही खुलकर सामने आ गया है। पीठ के तीसरे जज जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने परस्पर बातचीत से हल करने संबंधी याचिका पर अपना अलग से फैसला सुनाते हुए कहा है कि पीठ के दोनों जजों ने शुक्रवार को इस याचिका को खारिज करने का निर्णय देने से पहले उनसे परामर्श नहीं किया।
जस्टिस शर्मा ने सोमवार को इस फैसले पर अपना अलग असहमति का आदेश दे दिया। हालांकि शर्मा के इस फैसले से बेंच कें पूर्व में दिए गए फैसले पर कोई असर नहीं प़डेगा, क्योंकि वह बहुमत का फैसला माना जाएगा। अब यदि इसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करता है तो 24 सितंबर को फैसला आ जाएगा।
अपने फैसले में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने याद दिलाया है कि 27 जुलाई को सुनवाई पूरी होने के बाद पूर्ण पीठ ने अपने आदेश में स्वयं कहा था कि मुकदमे के पक्षकार इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि अगर मामले को समझौते से हल करने की कोई संभावना बनती है, तो वे 24 सितंबर को जजमेंट होने से पहले कभी भी अदालत के विशेष अधिकारी से संपर्क करके बेंच गठन करने का अनुरोध कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता रमेशचंद्र त्रिपाठी के अलावा मुकदमे का एक अन्य वादी निर्मोही अख़ाडा मामले को आपसी सहमति से तय करने के पक्ष में था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि कोर्ट इस संबंध में याचिकाकर्ता की नीयत पर शक नहीं करता। ऎसी स्थिति में रमेशचंद्र त्रिपाठी की याचिका शरारतपूर्ण नहीं मानी जा सकती। जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यह मामला फैजाबाद जिला अदालत से सिविल प्रोसीजर कोड के तहत ट्रांसफर होकर आया था और यहां सुनवाई ट्रायल कोर्ट के रूप में हो रही है, न कि हाईकोर्ट के, इसलिए इस मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका के व्यापक अधिकार हासिल नहीं हैं।
इससे पहले दोनों जजों जस्टिस एसयू खान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने याचिका को शरारतपूर्ण मानते हुए पचास हजार रूपए का जुर्माना ठोका था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 35ए के तहत तीन हजार से अधिक का जुर्माना लगाया ही नहीं जा सकता। उन्होंने अपने आदेश में कहा, मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि आदेश देते समय मुझसे परामर्श नहीं किया गया, अन्यथा मैं अपने जज भाइयों को अपनी राय से अवगत कराता। न्यायिक इतिहास में गंभीर टिप्पणी
कानून की दृष्टि से यह काफी गंभीर टिप्पणी मानी जा रही है। इससे पहले दोनों जजों ने अपने आदेश में जस्टिस शर्मा के बारे में बयान दिया था कि उन्होंने 13 सितंबर को अकेले ही रमेशचंद्र त्रिपाठी की याचिका में बेंच के सामने सुनवाई का आदेश दे दिया। अंत में जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में लिखा है कि मुकदमे के पक्षकार सिविल प्रोसीजदर कोड की धारा 89 के तहत फैसले की तारीख से पहले मामले को आपसी सहमति से तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। इस बीच याचिकाकर्ता रमेशचंद्र त्रिपाठी ने कहा है कि उनके वकील इस मामले में फैसले का समय बढ़ाने और केस को सहमति से हल करने का मौका देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।

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